*जब तक ध्यान शब्द-धुन से नहीं जुड़ता,*
*तब तक मनुष्य एक जानवर की तरह काम कर रहा है तथा उसे कभी भी शान्ति नहीं मिल सकती।*

*सिवाय नाम के कोई कर्म नहीं, जो बन्धनों से आज़ाद कर सके।*

*अगर मुक्ति है तो नाम में।*

*अमृत वचन*
*महाराज सावनसिंह जी*

image

*बाबा जी अकसर कहते हैं कि सब कुछ प्रसाद है।*

*इसका क्या मतलब है?*

*यह तो हम समझ ही सकते हैं कि प्रसाद सत्संगी के लिए सतगुरु का दिया तोहफ़ा है।*

*लेकिन...जब वह कहते हैं कि सब कुछ ही प्रसाद है तो हम उलझन में पड़ जाते हैं।*

*हम जानना चाहते हैं कि फिर प्रसाद क्या है?*

*वह हमें बताते हैं कि जो भी उस परमात्मा की देन है, वह प्रसाद है।*

*क्योंकि...परमात्मा सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ है इसलिए अपने आसपास हम जो भी देखते हैं, जिसे भी छूते हैं, क्या वह सब उसकी देन नहीं है?*

*हमारी हर साँस क्या उस परमात्मा से मिला तोहफ़ा नहीं है?*

*क्या हमें यह बात समझ नहीं आती कि हमारी हर साँस प्रसाद है?*

*अगर ऐसी बात है तो फिर हमें हैरानी होती है कि क्यों सतगुरु मिश्री के पैकेट पर दृष्टि डालकर संगत को प्रसाद देते हैं?*

*ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं?*

*बाबा जी के होंठों पर मुस्कान और आँखों में चमक होती है जब वह दोहराते हैं...सब कुछ प्रसाद है।*

*सतगुरु कहते हैं कि सब कुछ प्रसाद है पर हम उनके वचनों को समझ नहीं पाते।*

*हम केवल उनके चेहरे के भाव देखते हैं, उनकी दिल को छू लेनेवाली मुस्कान का आनंद लेते हैं लेकिन...उनके कहे वचनों को भूल जाते हैं।*

*हम दिखावे में पड़े रहते हैं क्योंकि...हमें दुनिया में इनाम पाने की इतनी आदत पड़ी हुई है,* *इसलिए हम इन बेड़ियों से आज़ाद नहीं हो पाते।*

*हमारी उसी ज़रूरत को देखते हुए अपना प्यार ज़ाहिर करने के लिए सतगुरु हमें प्रसाद देते हैं।*

*वह हमें हमेशा प्रेरणा और प्रोत्साहन देने के लिए प्रसाद देते हैं।*

*सतगुरु अपने रहस्यमय ढंग से हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं और हमें सचेत करने के लिए हमारे अंदर ऐसा बीज बो देते हैं ताकि हमें समझ आए।*

*फिर प्रसाद क्या है?*

*जो प्रसाद हमें बाहर मिलता है वह उस नियामत का एक छोटा सा नमूना है जो अंतर में हमारा इंतज़ार कर रहा है।*

*सतगुरु हमें लुभा रहे हैं, हमारे अंदर भूख जाग्रत कर रहे हैं, हमें उस असली दात को हासिल करने के लिए प्रेरणा दे रहे हैं जहाँ सब कुछ प्रसाद है।*

*वह चाहते हैं कि हम इन दुनियावी चीज़ों से ऊपर उठें, अपने अंतर की गहराई में झाँकें।*

*वह कहते हैं कि अगर बाहर का प्रसाद ही हमें इतना आनंद देता है तो अपने अंतर में प्रसाद लेकर देखो, आंतरिक आनंद का अनुभव करो।*

*बस एक बार वहाँ पहुँच जाएँ तो सब कुछ प्रसाद है--- अच्छा, बुरा, बदसूरत, जो है, जो नहीं है, सब कुछ।*

*अंतर में बस आनंद ही आनंद है; इसलिए...सब कुछ प्रसाद है।*

*वह हमें अंतर में जाने की प्रेरणा देते हैं ताकि हम समझ सकें कि इन दुनियावी इनामों की तुलना अंतर में मिलनेवाले आनंद से नहीं की जा सकती।*

*वहाँ कुछ जानने की ज़रूरत ही नहीं होगी हम पूर्ण ज्ञानी बन चुके होंगे;*
*वहाँ कुछ भी माँगने की ज़रूरत नहीं होगी,*

*क्योंकि....माँगने के लिए कुछ बाक़ी नहीं होगा; कोई चाहत नहीं रहेगी क्योंकि चाहने या न चाहने लायक़ कुछ भी नहीं होगा।*

*इसलिए बाबाजी समझाते हैं...अंतर में देखो,*

*दुनियावी चीज़ों से ऊपर उठो,*

*उस ओर देखो जहाँ सब कुछ प्रसाद है।*

*जागो रे प्यारे जागो*
*पेज-28*

About

nam japo prem karo